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गुर्जर आंदोलन में देरी के कारण

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🤝 *#__गुर्जर__आंदोलन__में__देरी__के__कारण_* 🤝 1. *5 मार्च को गुर्जर आंदोलन की पूरी तैयारी हो चुकी थी युवा आंदोलन के मुड़ में थे पर एन वक्त पर आंदोलन की तारीख क्यों बढ़ा दी गई ???* @. क्योंकि गुर्जर आंदोलन के मुख्य लीडर ने कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने कहा की में तुम्हे खुश करने के लिये किसानो को नुकसान नही पहुँचा सकता अभी खेतो ने काम का समय है कृषि हमारा मुख्य व्यवसाय है इसलिये खेतखलियानो से निपट लो 2. *25 दिन बाद मलारना स्टेशन पर सीधा रेल रोको आंदोलन का एलान 25 दिन तो पुरे हो गए ???* @. 25 दिन के अंदर अंदर रेल रोकना गुर्जरो के आसान था लेकिन मलारना स्टेशन के साथ अन्य जिलो में आंदोलन की रुपरेखा तैयार नही हुई इसके जिम्मेदार कर्नल बैंसला नही बल्कि वो तमाम गुर्जर नेता है जो कर्नल साहब की टीम के सदस्य है ये उनका कर्तव्य बनता है की हर जिले में आंदोलन के नेत्रत्वकर्ताओ का चयन कर लीडर को अवगत कराना लेकिन ये कर्नल की ही नही हमारी भी कमजोरी बनते जा रहे है सतर्क रहे 3. *प्रदेशभर में युवाओ ने गुर्जर महाआक्रोश रैलिया निकाली उसका क्या फायदा हुआ ???* @. गुर्जर य...

1857 की जनक्रांति के जनक धन सिंह कोतवाल गुर्जर

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1857 की जनक्रान्ति के जनक धन सिंह कोतवाल गुर्जर (Dhan Singh Kotwal Gurjar) डा. सुशील भाटी    DHAN SINGH KOTWAL GURJR इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति का प्रारम्भ '10 मई 1857' की संध्या को मेरठ में हुआ। हम तार्किक आधार पर कह सकते हैं कि जब 1857 की क्रान्ति का आरम्भ '10 मई 1857' को 'मेरठ' से माना जाता है, तो क्रान्ति की शुरूआत करने का श्रेय भी उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जिसने 10 मई 1857 के दिन मेरठ में घटित क्रान्तिकारी घटना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। ऐसी सक्रिय क्रान्तिकारी भूमिका अमर शहीद धन सिंह कोतवाल ने 10 मई 1857 के दिन मेरठ में निभाई थी। 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध साझा मोर्चा गठित कर क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया।1 सैनिकों के विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ की शहरी जनता और आस-पास के गांव विशेषकर पांचली, घाट, नंगला, गगोल इत्यादि के हजारों ग्रामीण मेरठ की सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए। इसी कोतवाली में धन सिंह कोतवाल (प्रभारी) के पद पर कार्यरत थे।2 मेरठ की पुलिस बाग...

गुर्जर भाईयों से निवेदन हे की अपनी प्राचीन धरोहर को बचालो

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गुर्जर समाज के सभी भाइयो को राम राम सा 🙏🏻 आज में आपके सामने बगड़ावत श्री सवाई भोज महाराज एवं उनके 23 भाइयो द्वारा निर्मित अति प्राचीन गुर्जर समाज की अनमोल  धरोहर लगभग 1150 वर्ष पुराने भगवान शंकर के मंदिर के बारे में अवगत करा रहा हूँ ।  जो कि अभी अपने गुर्जर  समाज व पुरातन विभाग की अनदेखी के कारण जीर्ण- शीर्ण की अवस्था मे है ।जो कि जोधपुर जिले के बिलाड़ा कस्बे से मात्र 6 किलोमीटर दूर हर्ष गाँव के पास स्थित है । बड़े बुजुर्गों के अनुसार बगड़ावत यहाँ पर अपनी गायें चराया करते थे । बगड़ावत भगवान शिव के परम भक्त थे , शिव भक्ति के कारण किवदंतियों के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि बगड़ावतों ने इस शिव मंदिर को एक ही रात में बनाया । कुछ कारणवश गुम्बद का ऊपरी हिस्सा पूर्ण न होने की वजह से या फिर हो सकता है क्षति ग्रस्त हुआ हो समय की मार से । जो आज भी अपूर्ण अवस्था मे  है । समाज के गणमान्य व्यक्तियों से अपील करता हूं कि समाज की इस अनमोल  धरोहर के संरक्षण हेतु आगे आये ।सरकार और संबधित विभाग को भी इसके सरंक्षण हेतु एक ज्ञापन देकर मुहिम चलाई ज...

मेरे इतिहास लेखन का एक लक्ष्य उनके सिर लगवाना है जिनके सर तोड़ दिए गए हें।

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“मेरे इतिहास लेखन का एक लक्ष्य उनके सिर लगवाना हैं जिनके सिर तोड़ दिए गए हैं|” डॉ सुशील भाटी 2016 IGD के अवसर पर जावली में मैंने कहा था कि “मेरे इतिहास लेखन का एक लक्ष्य उनके सिर लगवाना हैं जिनके सिर तोड़ दिए गए हैं|” साथियो इतिहास अधिकतर सभ्रांत और अभिजात्य मानसिकता से लिखा जाता हैं| इस कारण से वर्तमान में गैर-अभिजात वर्ग में गिने वाले जाट, अहीर, गुर्जर, लोध, कुर्मी, जाटव, भील, मुंडा संथाल, मेव, मीणा लुहार, बढई आदि भारत की लगभग पांच हज़ार जातियों और कबीलों को भारतीय इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल पाया हैं| नस्लीय तथा जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रस्त अभिजात्य मानसिकता की वज़ह से, बहुधा इनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों की उपेक्षा की गई हैं, या फिर इनके इतिहास को तोड मरोड़ कर अभिजात्य जातियों का इतिहास बना दिया गया हैं| गुर्जर शब्द स्थान वाचक हैं या कबीले का नाम? इस प्रश्न को खड़ा करके, गुर्जरों को उनके इतिहास से वंचित करने के प्रयासों से सभी परिचित हैं| वर्तमान इतिहास लेखन की इस परिपाटी से गैर-अभिजात्य कबीलों और जातियों का इतिहास और उनकी पहचान मिटती जा रही हैं| इस सब के बावजूद, समाज में अ...

गुर्जर कुषाण कालीन 'गुशुर' शब्द का परवर्तित रूप हें

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गुर्जर कुषाण कालीन ‘गुशुर’ शब्द का परवर्तित रूप हैं| डॉ सुशील भाटी गुशुर>गुजुर>गुज्जर>गुर्ज्जर>गुर्जर कुछ इतिहासकार के अनुसार गुर्जर शब्द की उत्पत्ति ‘गुशुर’ शब्द से हुई हैं| गुसुर ईरानी शब्द हैं| एच. डब्लू. बेली के अनुसार गुशुर’ शब्द का अर्थ ऊँचे परिवार में उत्पन्न व्यक्ति यानि कुलपुत्र हैं|  ‘गुशुर’ शब्द का आशय राजपरिवार अथवा राजसी परिवार के सदस्य से हैं| बी. एन. मुख़र्जी के अनुसार कुषाण साम्राज्य के राजसी वर्ग के एक हिस्से को ‘गुशुर’ कहते थे| उनके अनुसार ‘गुशुर’ सभवतः सेना के अधिकारि होते थे| कुषाण सम्राट कुजुल कड़फिसिस के समकालीन उसके अधीन शासक सेनवर्मन का स्वात से एक अभिलेख प्राप्त हुआ हैं, जिसमे‘गुशुर’शब्द सेना के अधिकारीयों के लिया प्रयुक्त हुआ हैं| सबसे पहले पी. सी. बागची  ने गुर्जरों की ‘गुशुर’ उत्पात्ति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था| प्रसिद्ध इतिहासकार आर. एस. शर्मा ने गुर्जरों की ‘गुशुर’ उत्पात्ति मत का  समर्थन किया हैं| उत्तरी अफगानिस्तान स्थित एक स्तूप से प्राप्त अभिलेख में विहार स्वामी की उपाधि के रूप में ‘गुशुर’ का उल्लेख किया गया ...

बदकिस्मती हम गुर्जरोँ की हम एक किरोड़ी न बना सके।

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#बदकिस्मती_गुर्जरों_कि_हम_एक_डॉ_किरोड़ी_न_बना_सके। मीणा जाति का सबसे बड़ा हित "ST कोटा" सुरक्षित करने के बाद डॉ. किरोड़ी लाल मीणा जी राष्ट्रीय राजनीति में नेतृत्व करने के लिए वापस अपने घर को लौट चुके हैं। आप मे से कुछ लोग उन्हें कौम का गद्दार कह सकते हैं, पर वास्तव में वे मीणा समाज के सच्चे हितेषी हैं, जिन्होंने जमें हुए राजनीतिक पद और पार्टी का परित्याग करके समाज को अपने हक़ के लिए खड़ा कर दिया और आज जब सबकुछ शांत है, उनकी कौम का हक़ सुरक्षित है तो न सिर्फ वे वापस अपने नीड़ को लौट चले, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में मीणा समाज के सितारा बनकर रहेंगे। इसे ही असली राजनीति कहते हैं कि जातिधर्म भी बखूबी निभा लिया और अब उसके साथ स्वविचारधारा के अनुसार भी जिएंगे। राजस्थान के गुर्जर राजनेताओं की इतनी बड़ी तो सोच ही नही है कि राजस्थान के विधायक से बाहर सोचने की हैसियत बना सकें औए हाँ, जिनकी है, उनकी नज़र में कौम की इतनी ज्यादा इज्जत नही है।    नीचे के अखबार के अनुसार अब गुर्जर समाज के 8 विधायकों में से किसी ऐसे को ढूंढा जावेगा जो सारे गुर्जर समाज को बावळा कर सकें, गुंजल उस लायक है पर येनकेन ...

शहीद परिवार की जितनी हो सके मदद जरूर करें।

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जय-जय बगड़ावत    आरक्षण आंदोलन 2007 मे शहीद रूप सिंह कसाना  निवासी दुब्बी ,सिकंदरा दौसा ,के परिवार की कहानी :-   रुपसिंह जी की शहादत के बाद उसके परिवार पर संकटो का पहाड़ टूट पड़ा जवान बेटे की मौत का गम लिए कुछ समय बाद  शहीद रुपसिंह जी के पिता का निधन हो गया ,आंदोलन मे  शहीद रूपसिंह सिंह जी  के निधन से पहले उनकी पत्नी भी 2 बेटियों को छोड़ इस दुनिया से  जा चुकी थी  ...शहीद का बचा परिवार संभलने ही लगा था   की परिवार की जिम्मेदारियां उठाते  शहीद रूपसिंह जी  के  छोटे भाई व उनकी धर्मपत्नी का भी  एक सड़क दुर्घटना मे स्वर्गवास हो गया    .. जिनके एक बेटा था ....2 साल पहले ब्लड कैंसर से वो भी शांत हो गया....आज परिवार मे कमाने वाला  यदि कोई है तो शहीद रुपसिंह जी की माँ रामेश्वरी देवी जो शहीद कोटे से मिली अनुकंपा नियुक्ति पर  दिल को पत्थर किये दौसा के भांडारेज मे विद्यालय मे हेल्पर के रूप मे सेवा दे रही है...उस वृद्धा की अंतिम इच्छा है  की उसके जीते जी जैसा भी हो दोनों लड़कियो का विवाह हो जाये...   ...